अखंड भारत मात्र एक विचार न होकर विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है। कुछ लोग विभाजन को पत्थर रेखा मानते है। उनका ऐसा दृष्टिकोण सर्वथा अनुचित है। मन में मातृभूमि के प्रति उत्कट भक्ति न होने का यह परिचायक है।
---- पंडित दीनदयाल उपाध्याय
मंगलवार, 4 अगस्त 2020
शिक्षा एक एसा धन है , जिसे कोई चुरा नहीं सकता और ना ही कोई छीन सकता है ।
------ चाणक्य
सोमवार, 3 अगस्त 2020
जिस प्रकार अयोग्य सेनापति द्वारा सेना का कुशल संचालन नहीं हो सकता उसी प्रकार कार्यकर्ता अकुशल हो तो शाखाएँ ठीक नहीं चल सकती । अतः प्रत्येक कार्यकर्ता को संघ का शिक्षण करना अनिवार्य है । ये वर्ग हमे कठिनाइयों में भी ध्येय का स्मरण रखते हुए संघ कार्य सिखाता है ।
---- परम पूजनीय श्री गुरुजी
आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते पर आप अपनी आदते बदल सकते है और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बादल देगी ।
----- डॉ. कलाम
मेरा संदेश विशेष रूप से युवाओ को है - वे अलग तरह से सोचने का साहस रखे , कुछ नया करने का साहस रखे , अनजाने रास्तों पर चलने का साहस रखें । असंभव को संभव करने का साहस रखें , समस्याओं पर जीत हासिल करने का साहस रखें । यही महान गुण है , जिन पर युवाओं को जरूर कार्य करना चाहिए ।
----- डॉ. कलाम
अपने समाज में मनुष्य बल, धन बल , बुद्धि बल , सब कुछ था परंतु मैं इस राष्ट्र का घटक हूँ तथा इसके लिए मेरा जीवन लगना चाहिए , यह भावना व्यक्ति के अंतकरण से लोप होने के कारण सब प्रकार की शक्ति के होते हुवे भी हिन्दू समाज पराभूत हुआ । इस सोचनीय अवस्था के निदान के रूप में समाज की नस नस मे राष्ट्रियता की उत्कट भावना को भरकर और इस भावना से प्रेरित होकर सम्पूर्ण समाज अनुशासित एवं संज्जीवित होकर पुनः दिग्विजय राष्ट्र के रूप में खड़ा हो , डॉक्टर जी के इस महामंगल संकल्प का मूर्त रूप है राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ ।
----- परम पूज्य रज्जु भैया
हिन्दू राष्ट्र के परम वैभव के साधन स्वरूप धर्म का संरक्षण और उसके लिए हिंदुओं की विजयशालिनी संगठित कार्य शक्ति अर्थात इस सम्पूर्ण हिन्दू समाज की सुसंगठित एवं अनुशासित अवस्था को आधार देना ही संघ कार्य है ।
----- श्री दत्तोपंत ठेंगडी जी
सच्ची शक्ति उसे कहते है , जिसमे अच्छे गुण , शील , विनम्रता , परोपकार की प्रेरणा तथा जन जन के प्रति प्रेम भरा हो । मात्र शारीरिक शक्ति ही शक्ति नहीं कहलाती है ।
----- प. पु. श्री गुरुजी
शक्ति केवल सेना या शस्त्रों में नहीं होती बल्कि सेना का निर्माण जिस समाज से होता है , वह समाज जितना राष्ट्रप्रेमी , नीतिमान और चरित्रवान सम्पन्न होगा , उतनी मात्रा में वह शक्तिमान होगा ।
------ प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
हमारी मातृभूमि भारत , एक रूप में ही माता , पिता एवं गुरु तीनों का कर्तव्य हमारे प्रति पूर्ण करती है ।
---- प. पु. श्री गुरुजी
रविवार, 2 अगस्त 2020
जो धर्म का वध करता है उसी का धर्म भी नाश करता है और जो धर्म का रक्षण करता है उसी का धर्म भी रक्षण करता है ।
------- युधिष्ठर(महाभारत)
धर्म मे ही भारत की जीवन शक्ति निहित है और जब तक यह हिन्दू जाति अपने पूर्वजो की इस विरासत को नहीं भूलती तब तक विश्व की कोई शक्ति इसका नाश नहीं कर सकती ।
------- स्वामी विवेकानंद
धर्म से ही धन , सुख सबको मन वांक्षित पदार्थ प्राप्त होते है , इसलिए संसार मे धर्म ही सार वस्तु है ।
----- अरण्यकांड (रामचरितमानस)
सहनशील होना अच्छी बात है , परंतु अन्याय का विरोध करना उससे भी अच्छा है ।
---- जयशंकर प्रसाद
फूलों की खुशबू वायु के विपरीत नहीं जाती पर मानवीय गुणों की खुशबू चारों और फैलती है ।
........ महात्मा बुद्ध
विद्या, वीरता, दक्षता , बल और धैर्य ये पांचों मनुष्य के स्वाभाविक मित्र है । बुद्धिमान जन सर्वदा इसके सहवास में रहते है ।
----- गुरु वेद व्यास
जिस राष्ट्र में चरितरशीलता नहीं है , उसमे कोई योजना काम नहीं कर सकती है ।
------ विनोबा भावे
किसी भी आंदोंलन में साधारण जनता, कार्यकर्ता के कार्य का उतना ख्याल नहीं करती , जितना की उसके व्यक्तिगत चरित्र का । इसलिए हमारी चादर इतनी साफ रहे कि हमारे चरित्र मे ढूंढने से भी दोष या कलंक का छीटा तक न मिले ।
------ प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
गुरु सर्वशक्तिमान तथा महान होता है । गुरु अनंत निर्मल तथा पवित्र होता है । गुरु की समानता कोई नहीं कर सकता ।
---- गुरु अर्जुन देव
एक अक्षर की शिक्षा देने वाला गुरु भी महान होता है । गुरु के इस उपकार के बदले में देने के लिए पृथ्वी में कोई भी वस्तु नहीं है , इस उपकार से व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता । शिष्य गुरु का सदा ऋणी रहता है ।
.... चाणक्य
कर्म करना बहुत अच्छा है पर वह विचारो से आता है इसलिए अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्चतम आदर्शों से भर लो , उन्हे रात दिन अपने सामने रखो , उनही में से महान कार्यों का जन्म होगा ।
......... स्वामी विवेकानंद
सफलता प्राप्त करने के लिए जबरदस्त सतत प्रयत्न और जबरदस्त इच्छा रखो । कड़ा परिश्रम करो । तुम अपने उद्देश्य को निश्चित पा जाओगे ।
...... स्वामी विवेकानंद
बुधवार, 29 जुलाई 2020
अत्यधिक परिश्रम व त्याग के बिना कोई महान कार्य सिद्ध नहीं होता । ध्येय मार्ग पर चलते हुवे , आने वाले कष्टो और संकटों को मुसकुराते हुए स्वीकार करना चाहिए ।
---- प. पु. श्री गुरुजी
शिक्षा का लक्ष्य है ; ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति । इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति ज्ञान और कौशल दोनों प्राप्त कर अपने जीवन को यशस्वी बना सकता है । करुणा , प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओ का विकास भी शिक्षा का उद्देश्य है ।
---- डॉ. राधाकृष्णन जी
जब तक नागरिकों के जीवन मे राष्ट्रहित का भाव नहीं आएगा , तब तक राष्ट्र की सुख समृद्धि संभव नहीं । सम्पूर्ण समाज , सम्पूर्ण राष्ट्र और उसका कण कण मेरा है , ऐसी भावना से ओतप्रोत वैचारिक मानसिक क्रांति की आज आवश्यकता है । एक देश और एक समाज का पूर्ण एकात्मक भाव प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न करना होगा । भावना और विचारो मे ऐसी सर्वांगीण क्रांति लाने के लिए ही अपना संघ कार्यरत है ।
----- प. पु. श्री गुरुजी
हम मे से हर एक स्वयंसेवक को एक आदर्श स्वयंसेवक बनना चाहिए । मैं आजन्म राष्ट्र सेवा के कार्य को करता रहूँगा , इस आत्मप्रेरणा को जाग्रत रखने के लिए हमे आदर्श मन और आदर्श तन की जरूरत होगी और इसको पाने के लिए हमे आदर्श गुण जैसे उत्साह , आत्मविश्वास , वीरता , पराक्रम , नमन की भावना आदि को अपने अंदर आत्मसात करना होगा ।
--- प. पु. श्री गुरुजी
संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है । संसार मे कोई भी समस्या शक्ति के आधार पर ही हल हो सकती है । शक्तिहीन राष्ट्र की कोई भी आकांक्षा कभी भी पूरी नहीं होती परंतु शक्तिशाली राष्ट्र कोई भी कार्य जब चाहे तब कर सकता है।
----- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
रविवार, 26 जुलाई 2020
जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सके , मनुष्य बन सके , चरित्र गठन कर सके और विचारो का सामंजस्य कर सके , वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।
----- स्वामी विवेकानंद जी
एक लक्ष्य निर्धारित कीजिये। उस लक्ष्य को ही पाना जीवन बनाइये। उस पर हमेशा विचार कीजिये , उसको पूरा करने का ही स्वप्न देखिये , उस लक्ष्य के ही जियें और अन्य सभी बातों को छोड़ दें। सफलता का यही मार्ग है।
------ स्वामी विवेकानंद जी
जब कभी भारत के सच्चे इतिहास का पता लगाया जायेगा , तब यह सन्देश प्रमाणित होगा कि धर्म के समान ही विज्ञान , दर्शन , संगीत , साहित्य , गणित , ललित कला आदि में भी भारत समग्र संसार का आदि गुरु रहा है।
------ स्वामी विवेकानंद जी
हमारे समाज पर निरंतर आघातों के बाद भी हम जीवित है, उसका मूल कारण हमारी समाज रचना है , जो आज भी विश्व को शांति का मार्ग बताने में समर्थ है। युद्ध ना हो , विश्व में शांति हो , सब लोग सुखी हो , परस्पर वैमनस्य ना हो , यह हमारी संस्कृति की कल्पना है। सर्वे भवन्तु सुखिन - हमारे पूर्वजो ने ही कहा है और उसे आचरण में भी उतारकर दिखाया है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक के अंत: करण में इसकी विशिष्टता का साक्षात्कार हो।
----- प. पु. श्री गुरूजी
छोटी - छोटी बातों को नित्य ध्यान रखे। बूँद बूँद मिलकर ही बड़ा जलाशय बनता है। एक - एक त्रुटि मिलकर ही बड़ी - बड़ी गलतियां होती है , इसलिए शाखाओं में जो शिक्षा मिलती है , उसके किसी भी अंश को नगण्य अथवा कम महत्त्व का नहीं मानना चाहिए।
---- प. पु. श्री गुरूजी
हम लोगो को हमेशा सोचना चाहिए कि जिस कार्य को करने का हमने प्रण लिया है और जो हमारे सामने है , उसे प्राप्त करने के लिए हम जितना कार्य कर रहे है , जिस गति से एवं जिस प्रमाण से हम अपने कार्य को आगे बढ़ा रहे है , क्या वह गति और प्रमाण हमारी कार्य सिद्धि के लिए पर्याप्त है। ---- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
अपने हिंदू समाज को बलशाली और संगठित करने के लिए ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन्म लिया है।
----- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
जिस राष्ट्रीय प्रतिक को लेकर वेदकाल से आज तक हम स्फूर्ति पाते रहे , जिसमे सदियों के उत्थान पतन के रोमांचकारी क्षणों की गाथाएं गुम्फित है , जिसमे त्यागी , तपस्वी , पराक्रमी , दिग्विजयी , ज्ञानी , ऋषि मुनि , सम्राट , सेनापति , कवी , साहित्यकार , सन्यासी और असंख्य कर्मयोगी के चरित्रों का स्मरण अंकित है , जहाँ दार्शनिक उपलब्धियों के साथ जीवन होम करने के असंख्य उदहारण हमारे स्मृति पटल पर नाच उठते है , यह परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारी अखंड राष्ट्रीय परम्परा का प्रतिक बनकर हमारे सामने उपस्तिथ होता है।