बुधवार, 29 जुलाई 2020

अत्यधिक परिश्रम व त्याग के बिना कोई महान कार्य सिद्ध नहीं होता । ध्येय मार्ग पर चलते हुवे , आने वाले कष्टो और संकटों को मुसकुराते हुए स्वीकार करना चाहिए ।
---- प. पु. श्री गुरुजी 
शिक्षा का लक्ष्य है ; ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति । इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति ज्ञान और कौशल दोनों प्राप्त कर अपने जीवन को यशस्वी बना सकता है । करुणा , प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओ का विकास भी शिक्षा का उद्देश्य है ।
---- डॉ. राधाकृष्णन जी 
जब तक नागरिकों के जीवन मे राष्ट्रहित का भाव नहीं आएगा , तब तक राष्ट्र की सुख समृद्धि संभव नहीं । सम्पूर्ण समाज , सम्पूर्ण राष्ट्र और उसका कण कण मेरा है , ऐसी भावना से ओतप्रोत वैचारिक मानसिक क्रांति की आज आवश्यकता है । एक देश और एक समाज का पूर्ण एकात्मक भाव प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न करना होगा । भावना और विचारो मे ऐसी सर्वांगीण क्रांति लाने के लिए ही अपना संघ कार्यरत है ।
----- प. पु. श्री गुरुजी 
हम मे से हर एक स्वयंसेवक को एक आदर्श स्वयंसेवक बनना चाहिए । मैं आजन्म राष्ट्र सेवा के कार्य को करता रहूँगा , इस आत्मप्रेरणा को जाग्रत रखने के लिए हमे आदर्श मन और आदर्श तन की जरूरत होगी और इसको पाने के लिए हमे आदर्श गुण जैसे उत्साह , आत्मविश्वास , वीरता , पराक्रम , नमन की भावना आदि को अपने अंदर आत्मसात करना होगा ।
--- प. पु. श्री गुरुजी
संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है । संसार मे कोई भी समस्या शक्ति के आधार पर ही हल हो सकती है । शक्तिहीन राष्ट्र की कोई भी आकांक्षा कभी भी पूरी नहीं होती  परंतु शक्तिशाली राष्ट्र कोई भी कार्य जब चाहे तब कर सकता है।

-----  प. पु. डॉ. हेडगेवार जी 

रविवार, 26 जुलाई 2020

जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सके , मनुष्य बन सके , चरित्र गठन कर सके और विचारो का सामंजस्य कर सके , वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।
----- स्वामी विवेकानंद जी 
एक लक्ष्य निर्धारित कीजिये।  उस लक्ष्य को ही पाना जीवन बनाइये।  उस पर हमेशा विचार कीजिये , उसको पूरा करने का ही स्वप्न देखिये , उस लक्ष्य के ही जियें और अन्य सभी बातों को छोड़ दें।  सफलता का यही मार्ग है।
------ स्वामी विवेकानंद जी 
जब कभी भारत के सच्चे इतिहास का पता लगाया जायेगा , तब यह सन्देश प्रमाणित होगा कि  धर्म के समान ही विज्ञान , दर्शन , संगीत , साहित्य , गणित , ललित कला आदि में भी भारत समग्र संसार का आदि गुरु रहा है।
------ स्वामी विवेकानंद जी 
हमारे समाज पर निरंतर आघातों के बाद भी हम जीवित है, उसका मूल कारण  हमारी समाज रचना है , जो आज भी विश्व को शांति का मार्ग बताने में समर्थ है।  युद्ध  ना हो , विश्व में शांति हो , सब लोग सुखी हो , परस्पर वैमनस्य ना हो , यह हमारी संस्कृति की कल्पना है।  सर्वे भवन्तु सुखिन - हमारे पूर्वजो ने ही कहा है और उसे आचरण में भी उतारकर दिखाया है।  आवश्यकता इस बात की है कि  प्रत्येक के अंत: करण  में इसकी विशिष्टता का साक्षात्कार हो।
-----  प. पु. श्री गुरूजी 
छोटी - छोटी बातों को नित्य ध्यान रखे।  बूँद बूँद मिलकर ही बड़ा जलाशय बनता है।  एक - एक त्रुटि मिलकर ही बड़ी - बड़ी गलतियां होती है , इसलिए शाखाओं में जो शिक्षा मिलती है , उसके किसी भी अंश को नगण्य अथवा कम महत्त्व का नहीं मानना  चाहिए।  
---- प. पु. श्री गुरूजी 
हम लोगो को हमेशा सोचना चाहिए कि  जिस कार्य को करने का हमने प्रण  लिया है और जो हमारे सामने है , उसे प्राप्त करने के लिए हम जितना कार्य कर रहे है , जिस गति से एवं जिस प्रमाण से हम अपने कार्य को आगे बढ़ा रहे है , क्या वह गति और प्रमाण हमारी कार्य सिद्धि के लिए पर्याप्त है। 
---- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी 
अपने हिंदू  समाज को बलशाली और संगठित करने के लिए ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन्म  लिया है।
----- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी 

जिस राष्ट्रीय प्रतिक को लेकर वेदकाल से आज तक हम स्फूर्ति पाते रहे , जिसमे सदियों के उत्थान पतन के रोमांचकारी क्षणों की गाथाएं गुम्फित है , जिसमे त्यागी , तपस्वी , पराक्रमी , दिग्विजयी , ज्ञानी , ऋषि मुनि , सम्राट , सेनापति , कवी , साहित्यकार , सन्यासी और असंख्य कर्मयोगी के चरित्रों का स्मरण अंकित है , जहाँ दार्शनिक उपलब्धियों के साथ जीवन होम करने के असंख्य उदहारण हमारे स्मृति पटल पर नाच उठते है , यह परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारी अखंड राष्ट्रीय परम्परा का प्रतिक बनकर हमारे सामने उपस्तिथ होता है।

 -----  पंडित दीनदयाल उपाध्याय