रविवार, 26 जुलाई 2020

हमारे समाज पर निरंतर आघातों के बाद भी हम जीवित है, उसका मूल कारण  हमारी समाज रचना है , जो आज भी विश्व को शांति का मार्ग बताने में समर्थ है।  युद्ध  ना हो , विश्व में शांति हो , सब लोग सुखी हो , परस्पर वैमनस्य ना हो , यह हमारी संस्कृति की कल्पना है।  सर्वे भवन्तु सुखिन - हमारे पूर्वजो ने ही कहा है और उसे आचरण में भी उतारकर दिखाया है।  आवश्यकता इस बात की है कि  प्रत्येक के अंत: करण  में इसकी विशिष्टता का साक्षात्कार हो।
-----  प. पु. श्री गुरूजी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें