अत्यधिक परिश्रम व त्याग के बिना कोई महान कार्य सिद्ध नहीं होता । ध्येय मार्ग पर चलते हुवे , आने वाले कष्टो और संकटों को मुसकुराते हुए स्वीकार करना चाहिए ।
---- प. पु. श्री गुरुजी
शिक्षा का लक्ष्य है ; ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति । इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति ज्ञान और कौशल दोनों प्राप्त कर अपने जीवन को यशस्वी बना सकता है । करुणा , प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओ का विकास भी शिक्षा का उद्देश्य है ।
---- डॉ. राधाकृष्णन जी
जब तक नागरिकों के जीवन मे राष्ट्रहित का भाव नहीं आएगा , तब तक राष्ट्र की सुख समृद्धि संभव नहीं । सम्पूर्ण समाज , सम्पूर्ण राष्ट्र और उसका कण कण मेरा है , ऐसी भावना से ओतप्रोत वैचारिक मानसिक क्रांति की आज आवश्यकता है । एक देश और एक समाज का पूर्ण एकात्मक भाव प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न करना होगा । भावना और विचारो मे ऐसी सर्वांगीण क्रांति लाने के लिए ही अपना संघ कार्यरत है ।
----- प. पु. श्री गुरुजी
हम मे से हर एक स्वयंसेवक को एक आदर्श स्वयंसेवक बनना चाहिए । मैं आजन्म राष्ट्र सेवा के कार्य को करता रहूँगा , इस आत्मप्रेरणा को जाग्रत रखने के लिए हमे आदर्श मन और आदर्श तन की जरूरत होगी और इसको पाने के लिए हमे आदर्श गुण जैसे उत्साह , आत्मविश्वास , वीरता , पराक्रम , नमन की भावना आदि को अपने अंदर आत्मसात करना होगा ।
--- प. पु. श्री गुरुजी
संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है । संसार मे कोई भी समस्या शक्ति के आधार पर ही हल हो सकती है । शक्तिहीन राष्ट्र की कोई भी आकांक्षा कभी भी पूरी नहीं होती परंतु शक्तिशाली राष्ट्र कोई भी कार्य जब चाहे तब कर सकता है।
----- प. पु. डॉ. हेडगेवार जी
रविवार, 26 जुलाई 2020
जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सके , मनुष्य बन सके , चरित्र गठन कर सके और विचारो का सामंजस्य कर सके , वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।
----- स्वामी विवेकानंद जी
एक लक्ष्य निर्धारित कीजिये। उस लक्ष्य को ही पाना जीवन बनाइये। उस पर हमेशा विचार कीजिये , उसको पूरा करने का ही स्वप्न देखिये , उस लक्ष्य के ही जियें और अन्य सभी बातों को छोड़ दें। सफलता का यही मार्ग है।
------ स्वामी विवेकानंद जी